(सखी!हे रे बदरवा)
तन मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा
करे छेड़खानी मोहे छेड़े बदरवा.
सिहर-सिहर जाऊँ शरमाऊँ इत-उत,
मोहे पिया की तरह सखी!घेरे बदरवा.
तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.
चुंबन पर चुंबन की है झड़ी,
बूंद-बूंद चुंबन सखी!ले रे बदरवा.
तन-मन भिगोए सखी!हे रे बदरवा.
अंखियों को खोलू अंखियों को मूंदु
जैसे मेरी अंखियों में कुछ सखी! ढुढ़े बदरवा.
तन-मन भिगोए सखी! हे रे बदरवा.
मेरी यौवन का आंचल छत पर गिरा,
मेरी रुप का पढ़े मेघदुतम सखी! हे रे बदरवा.
तन-मन भिगोए सखी हे रे बदरवा.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
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