ख्वा़हिशो को खाक न दो!
एै मेरे शौहर-----------
सरिया के नाम पे,
मुझे बेजा तलाक न दो।
बख्श दो---------
कहा जाऊँगी ले मासुम बच्चे,
मुझ बेगुनाह को-------
इतना भी शाॅक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न उड़ेलो कान में पिघले हुये शीशे,
मुझ बांदी को सजा तुम--------
इतनी खौफ़नाक न दो,
बेजा तलाक न दो।
न छिनो छत,न लिबास
खुदा के वास्ते रहने दो,
मेरी बेगुनाही झुलस जाये-------
मुझे वे तेजाब न दो,
बेजा तलाक न दो।
सी लुंगी लब,रह लुंगी लाशे जिंदा,
लाके रहना तुम दु जी निकाहे औरत,
मै उफ न करुंगी!
बस मेरे बच्चो की खुशीयो को कोई बेजा,
इस्लामी हलाक न दो-------
बेजा तलाक न दो।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
____तलाक एक दर्द है जो इसे भुगत रही कोई औरत ही समझ सकती है!अगर संभव है तो मेरी इस रचना के पढ़ने वालो से मेरी कलम अनुरोध करती है प्लीज कभी किसी भी औरत से बेजा तलाक न ले,शुक्रिया।
@@@शुक्रिया!साप्ताहिक समाचारपत्र अकोदिया सम्राट(म.प्र.)मेरी इस कविता को अपना बेशकिमती स्नेह देने के लिये।
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