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अयोध्या छोड़ अब काशी आ रहे है,
चोला बदल के सियासत के संन्यासी आ रहे है।
ऐ,रंग-----महिनो चलेगा इनका ये कुम्भ,
कुर्सी के भक्त बनके कल्पवासी आ रहे है।
(2)
पहले राम ठिकाने लगे है,
सावधान हो जाओ-------
हे!लोकतंत्र की शबरी,
ये तुमको दलित बता------
अब तुम्हारे घर खाने लगे है।
पहले राम ठिकाने लगे है।
@@@ये साहित्यकार की अभिब्यक्ती है इसका आशय किसी पार्टी से जुड़े ब्यक्ति को आहत करना नही है,गर संयोग वस ऐसा है तो मै पहले ही इसके लिये क्षमा मांग लेता हूँ।
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