मैं शरीर नहीं
और ना ही तुम्हारे शहर की बेटी हूं
मैं तमाशा हूं,मेरी फोटो
किसी अखबार के लिए मत खींचो .
इन खाली बोतलों पर मैंने
अपने छोटे भाई बहनों की भूख का तवा रखा हैं .
धूप तुम्हें लग रही होगी
छाए में खड़े हो जाओ साहब
तुम्हारे वहा से फेके हुए कुछ सिक्कों से
इस चूल्हे का ईधन सुलगेगा.
और मैं खुद को
जब इन बोतलों के इधर उधर पलटूंगी
तो सिकेंगी कुछ रोटियां.
मैं जानती हूं ,कि कुछ लोग
तमाशे की आड़ में
देखते हैं
मेरी दुपट्टे के उस तरफ का अंकुरण
उनकी लार टपकती हैं.
वे खाना चाहते हैं
किसी बंद कमरे में उधेड़ कर
मेरे "जिस्मानी पराठे"
लेकिन मैं
किसी आवारा बांह के तकिए से दूर
इस खुरदरे फुटपाथ पर
निवाले के लिए लेटी हूं.
"सर्वाधिकार सुरक्षित"
रचनाकार----
रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियापुर
जौनपुर,222002 (U P)
mo.no.7800824758
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