Sunday, 22 September 2024

(रेगमाल सी जिंदगी)

(रेगमाल सी जिंदगी)
कौन नही बुनता-----------
जुलाहे के कालीन सी जिंदगी!
तरह-तरह के धागे में पिरो,
कौन नही देखना चाहता मुकम्मल अपना शाहकार,
पर हो नही पाता ज्यो का त्यो चाहा,
फंस के खत्म हो जाती है मछली सी----
किसी मछेरे के जाल सी जिंदगी।
सारी ख्व़ाहिशे धरी रह जाती है,
एक-एक कर खत्म होती जाती है,
एै रंग------------------
यहां पे सबकी है रेगमाल सी जिंदगी।

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