मैं तेरे वंश को चलाने के लिए
एक बार फिर
अपनी कोख में कुछ बो नही सकती.
दो बार बोया तो बेटियां हुई
मासूम,चंचल,कोमल
इन्हें प्यार दो
ये भी वंश है
हा अगर तुम नही माने
और तुम्हारी मां जिद पर अड़ी रही
तो अब तुम भी
मेरे स्त्रीत्व को बरगलाकर
मेरी कोख में
कुछ नया बो नही सकते.
सब कमी दोष मुझी में था
तुम पुरूष हो
तुम्हें दंभ हैं
अपने पुरूष होने के शुक्राणुओं पर
सच तो यह है
कि सारी कमी तुममे है
क्योंकि तुम
अभी तक अपने मन में
एक पिता बो नही पाए.
✍️✍️यह स्वरचित और अप्रकाशित है.
रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियाँपुर
जिला--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com
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