Tuesday, 17 October 2023

(नई संसद)

(नई संसद)

तुम पर गर्व है,फक्र है
ऐ नई संसद!

बहुत कुछ बदला समय के साथ
आखिर कब तलक पहनती
तू किसी और की दी हुई 
भीख में,मिर्जई संसद.

उतार दे!
आ चल! अब नए चोले में 
क्योंकि,ये कुनबा तेरा है,
संस्कार तेरे है
तू भारत है
और तेरी आत्मा है 
यह नई संसद. 

राजनीति 
और नेताओं के चरित्र का क्या है?
हम सभी जानते हैं 
कि ये सभी
अपनी शब्दो के 
चारित्रिक दुशाशन है 
ना जानें कब खीच दे 
तेरी मर्यादा के सीने से आंचल
और तू शर्म से सिसकने लगे
ऐ नई संसद.

फिर चुनाव में इन्हें अपनी 
राजनीतिक रोटियां भी सेकनी है 
इसलिए,
एक सुर,एक लय, एक ताल
में कह नही सकते 
कि तेरी जरूरत थी
इस देश को
ऐ नई संसद.


यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.

रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758

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