(पूर्णमासी की चाँद है)
तुझसे मेरी दुनिया आबाद है,
तू मह़ज पत्नी नहीं,
मेरी ----
पूर्णमासी की चाँद है.
ये हसी,
मेरे होंठ पे, यूँ ही नहीं आई,
ये सांस और धड़कन,
यूँ नहीं आई,
तू खींच लाई,
फिर-फिर मुझे आसमां से,
अपने तीज और करवे के लिए,
सच मे!! तुम मेरे गीतों की,
शीतल, निर्मल, निर्छल सी आवाज़ है.
तू मह़ज पत्नी नहीं---
मेरी पूर्णमासी की चाँद है.
ये रात और चाँद का संगम,
तेरे रहते शायद ही टुटे प्रिये,
तू मेरे प्राणों की मणि है,
और मेरे पूर्णमासी की चाँद है.
तू मह़ज पत्नी नहीं---
मेरी पूर्णमासी की चाँद है.
@रंगनाथ द्विवेदी
No comments:
Post a Comment