औरत इस्ल़ाम मे इतना भी हक नही रखती,
खुदा का दर भी है मर्दे मस्ज़िद,
ये वहाँ भी नमाज़-ए-सज़दा कर नही सकती।
औरत इस्ल़ाम मे इतना भी हक नही रखती।
पर्दा दर पर्दा घुटी जाती है ये बंदिशो की चारदिवारी में-------
ऐ,रंग-----ये अपने साँसो की कुर्आन भी------------
अपनी मरज़ी से पढ़ नही सकती।
औरत इस्लाम में इतना भी हक नही रखती।
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