Thursday, 25 January 2024

(छब्बीस जनवरी)

(26 जनवरी)
एक माँ-----------
अपने दुध-मुँहे बच्चे का पेट भरने के लिये,
लुट के आई है अस्त-व्यस्त,
पुरी रात इसकी बदन पे,
बेरहमी से इसके ग्राहक ने लिखा है,
अपने हवस के जंगली नाखूनो से-----
26 जनवरी।
वे देखो फिर रहा युवा--------
अपनी डिग्रीयो की लाश लिये कांधे पे,
माँ बहन की आबरु चंद चिथड़ो मे लिपटी है,
बाप टी.बी. से खाँस रहा,
कहाँ है इसका वंदे-मातरम कहाँ है इसकी--
26 जनवरी।
देश के रहनुमा वे है,
जिन्हें मादरे तमीज़ तक नही,
वे देखो फहरा के लौटे है तिरंगा,
और उसी जश्न मे खुली शराब की बोतल,
बगल सोफे पे गिरी गाँधी टोपी,
अस्त-व्यस्त खद्दर की धोती,
सच मे एै"रंग" देखो इस देश मे,
इस तरह से भी मनाई जाति है----
26 जनवरी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

दिल्ली से प्रकाशित नेशनल ऐक्सप्रेस में मेरी कविता"छब्बीस जनवरी"को स्थान देने के लिये संपादक को मेरा हृदय से आभार।

No comments:

Post a Comment