बहन की राखी दुश्मनो से लड़ने,
करगिल और पठानकोट तक जाती है।
शहीद की माँ का कलेज़ा फटता है,
इसकी बेवा चिखती है,
फिर भी वंदे मातरम की आवाज़,
सुनो इसके बुढ़े बाप के-----
कप कपाते होठ से आती है।
ऐ,रंग--फिर भी हर मर्तबा कितने गर्व से-
हमारी छप्पन इंच की छाती-----
लाहौर तक जाती है।
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