यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती-
ये शहर की मशहूर-तवायफ की कब्र है।
आज भी करती है,ये रुहे मूज़रा-
फिर फुट के रोती है।
ऐ,रंग-बस आ जाते है-
खिज़ा मे दरख्तो के चंद पत्ते-
आवारगी करने।
ये शहर के मशहूर,तवायफ की कब्र है।
खिज़ा-पतझड़
दरख्त़-वृक्ष।
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