Monday, 29 January 2024

(होंठो की कैद में है)

(होंठो की कैद मे है)
उसने पेंच दर पेंच पहना दी हथकड़ी हमको,
हम अब उनकी मस्त सी जूल्फों की कैद मे है।
जी भी नही करता कि वे रिहा कर दे,
डाल दे कोठरी मे वे सज़ा दे----------
हम तो उनकी आँखो की कैद मे है।
ये सुखन-ऐ-किस्मत है मेरी---------
कि मेरा ये बदन उनकी बाँहो की कैद मे है।
मेरी प्यासे तड़प बुझ जाती है रोज,
क्योंकि इंतजार के सहरा के उस तरफ़,
वे पिलाती है हमें झील का पानी,
जो केवल उसकी---------
दो खूबसूरत सी होंठो की कैद मे है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

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