(और एक ताज़महल)
मुहब्बत की निशानी की खातिर है याद महल-----
उफ!आज सियासत की ज़द में है ताज़महल।
मै नही कहता कि लड़ा जाये इस जगह------
लड़ने को और भी है इसके बाद महल।
कुछ जोड़े कसम खाते है न जुदा होने की--------
एैसा इसके सिवा दुनिया में नही है मुझे कोई याद महल।
रहने दो इसे मंदिर-मस्जिद मत कहो------
जैसे भी है रहने दो इस ज़मीने जन्नत मे ये आबाद महल।
क्योंकि जानता हूँ एै "रंग" कि बना नही सकती ये दुनिया---
इस ज़मी पे कोई एक और ताज़महल।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.----7800824758
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