Rangnath Dubey's Poems
Friday, 14 October 2022
(फकीर हूँ)
ना शाह हूँ,ना वजीर हूँ।
सबकी भूख है,केवल
दो वक्त की रोटी-
मै उसी का मजूर हूँ।
खुद को बांधता हूँ,कसता हूँ।
सच कहूँ,गर मै तो रंग,-
एक गृहस्थ फकीर हूँ।
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