बीसों बसंत मै सजी---
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसों बसंत मै सजी.
कोयल हुई बाँवरी-
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुवे को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग---
बीसों बसंत मै सजी.
यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी मेरी
पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम----
कोई ऐसी बान मारो
कि आये बाबुल के गाँव अब,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलूं उसमे
अपने पिया के गाँव,
फिर मैं छुईमुई सी बैठूं
सुहाग सेज पर
वे घूंघट मेरी उठाए,
मै शर्म से सिमट जाऊं
और मूंद जाएं मेरे
मद भरे नयन
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और मैं
इस कंपकपी की रात को,
जतन कर सहेजे,
अपने बीसों बसंत जीलूं.
बीसों बसंत मै सजी.
यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
चित्र गुगल से साभार.
रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com
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