Tuesday, 4 February 2025

(एक रविवार मेरा भी हो)

(एक रविवार मेरा भी हो)

एक छुट्टी 
एक प्यार मेरा भी हो ,
तुम्हारे तो कई आते हैं 
महीने में 
एक रविवार मेरा भी हो.

तुम 
किचन में जाओ 
प्यार से नाश्ते बनाओ ,
मैं इंतजार करूं 
और पढूं घंटों 
महीने में एक अखबार मेरा भी हो.

तुम कपड़े धूलों 
सुखाओ,बड़बड़ाओ 
मैं मुस्कुराऊं 
महीने में 
एक दिन की यह छुट्टी 
यह प्यार मेरा भी हो,
तुम्हारे तो कई आते हैं 
महीने में 
एक रविवार मेरा भी हों.

मैं तुम्हारे साथ 
पति की तरह विहेब करूं 
तुम्हें 
स्कूटी पर बिठाकर 
कही दूर,
डिनर पर ले जाऊं, 
तुम्हारी बातों पर घंटों हसू 
और तुम 
मेरी तरह शरमाओ
तुम्हें शर्माते हुए देखने की 
एक छुट्टी 
एक प्यार मेरा भी हो.

तुम्हारे तो कई आते हैं 
महीने में 
एक रविवार मेरा भी हो.

यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
चित्र गुगल से साभार.

रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियाँपुर 
जौनपुर--222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com

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