छोड़ दो तालीम---
खुद को मजहबी किताब में रखों,
भाड़ में जाए इक्कीसबी सदी,
और तरक्की,
तुम महज़ एक मर्दे बदन हो,
आज भी.
इसलिए तुम,
उनके इस मर्दे बदन को,
उनके इस्लामी---
"हिजाब में रखों"
"यहां मैं यह स्पष्ट कर दूं कि जिसके हिस्से की जो भी आजादी है, उसे बिना किसी जाति मजहब के मिलनी चाहिए चाहे वह महिला हो या पुरुष"
अगर हम 21वीं सदी की बात करते हैं तो हमें महिलाओं लड़कियों को भी उनका न्यायोचित हक देना होगा.
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