चला गया--
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.
ये खालीपन न जाने कब भरेगा,
फिर कौन?
निभायेगा और डूब जायेगा,
सिनेमा के उस
"अर्धसत्य" के किरदार में,
शायद कोई नहीं!
वे खुरदरा सा चेहरा--
अब भी मेरी जेहन में घुमड़ रहा है,
जिसकी सीरत की खूबसूरती से,
बन जाया करता था--
उन दिनों बहुत महान थिएटर.
मुझे भली-भांति वे सीन याद है,
जब दंगे पे लिखे नाटक का दर्द,
उस चेहरे पे उभरा,
तो मैं एकटक तकता रहा,
जैसे जिंदा हो गया हो
हू–ब–हू वही दंगा,
मारकाट,लाशो की पीड़ा,
उफ!उस किरदार की
दोनो आँखो के आँसूओ से,
बन गया था, कुछ घंटो के लिये,
वही दंगाई शहर!
उफ!नही दे सकता
वरना देता--
ओमपुरी के लिये एक बयान थिएटर.
चला गया---
इस फानी दुनिया से
करके विरान थिएटर.
""""ओम पुरी जैसे एक महान कलाकार को मेरी श्रद्धांजलि"""""
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
rangnathdubey90@gmail.com
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