Saturday, 17 January 2026

उनके आधे शरीर पर लकवा मार गया था। ये देख डायरेक्टर ने शूटिंग रोक दी। लेकिन उन्होंने कहा,"नहीं, अभी एक शॉट बाकी है। जिस तरफ से मेरा शरीर हिल रहा है, उस तरफ कैमरा लगा लो।" डायरेक्टर ने वैसा ही किया। लीला जी ने जैसे-तैसे अपना शॉट पूरा कर दिया। उसके बाद फौरन उन्हें मुंबई ले जाया गया। एक बढ़िया हस्पताल में एडमिट कराया गया। मगर कुछ ही दिनों बाद हार्ट अटैक की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। 
 
जिस तारीख को लीला मिश्रा जी की मृत्यु हुई थी वो थी 17 जनवरी 1988. और जिस फिल्म की शूटिंग के दौरान लीला मिश्रा जी को पैरालाइज़ अटैक आया था वो थी साल 1989 में रिलीज़ हुई दाता, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती हीरो थे। हीरोइन थी पद्मिनी कोल्हापुरे। लीला मिश्रा जी के किरदार का नाम इस फिल्म में जमुना था। दाता लीला मिश्रा जी की आखिरी फिल्म साबित हुई। वैसे दो-तीन फिल्में ऐसी भी थी जो उनकी मृत्यु के बाद भी रिलीज़ हुई थी। मगर उन सबकी शूटिंग लीला मिश्रा जी दाता से भी पहले कर चुकी थी। वो सभी लेट रिलीज़ होने वाली फिल्में थी।  

यूं इस तरह पांच दशकों से चला आ रहा लीला मिश्रा जी का फिल्मी सफ़र उनके साथ ही खत्म हो गया। लीला मिश्रा जी की कहानी जानने का प्रयास करें तो पता चलता है कि 1 जनवरी 1908 को अमेठी ज़िले के जायस कस्बे में उनका जन्म हुआ था। वो एक अमीर परिवार में पैदा हुई थी। उनके पिता ज़मींदार थे। हालांकि उस दौर की रूढ़िवादी सोच के चलते लीला जी को पढ़ाया-लिखाया नहीं गया था। और मात्र 12 साल की उम्र में ही उनकी शादी भी करा दी गई थी। 
 
लीला जी के पति का नाम था राम प्रसाद मिश्रा। उनके बारे में भी बताया जाता है कि वो एक एक्टर थे और छोटे-मोटे किरदार फिल्मों में निभाते थे। 17 साल की उम्र तक लीला मिश्रा दो बेटियों की मां बन चुकी थी। एक दिन लीला जी के पति ने उन्हें मामा शिंदे नामक एक व्यक्ति से मिलाया। मामा शिंदे उस वक्त दादा साहेब फाल्के की फिल्म कंपनी नासिक सिनेटोन में नौकरी करते थे। लीला जी से मिलकर मामा शिंदे ने सुझाव दिया कि इन्हें भी एक्टिंग करनी चाहिए। पहले तो लीला जी हिचकिचाई। क्योंकि उस ज़माने में औरतों का फिल्मों में काम करना पाप समझा जाता था। 

और लीला मिश्रा जी तो थी भी एक अच्छे खानदान से। मगर बाद में पति के कहने पर वो फिल्मों में काम करने को तैयार हो गई। मगर उन्होंने तय किया कि किसी भी तरह का रोमांटिक किरदार वो नहीं निभाएंगी। उनके इस फैसले की वजह से कई ओपर्च्यूनिटीज़ भी उनके हाथों से निकल गई थी। मगर लीला जी अपनी सभ्यता से परे ना जाने के अपने फैसले पर अडिग रही। विकीपीडिया पर बताया जाता है कि नासिक फिल्म कंपनी में लीला मिश्रा जी को 500 रुपए महीना तनख्वाह पर बतौर एक्ट्रेस नौकरी पर रखा गया था। 
 
जबकी उनके पति राम प्रसाद को 150 रुपए महीना तनख्वाह देना तय हुआ था। पांच सौ रुपए बहुत ही बड़ी रक़म थी उस ज़माने में। और लीला जी को इतनी ज़्यादा फीस दिए जाने की वजह ये थी क्योंकि उस वक्त फिल्मों में काम करने के लिए महिलाएं मिलती ही नहीं थी। अन्य महिलाएं भी फिल्मों में काम करने को प्रोत्साहित हों, इसलिए लीला मिश्रा को इतनी बड़ी रक़म दी गई थी। हालांकि जब एक्टिंग की बारी आई तो कैमरे के सामने लीला मिश्रा जी परफॉर्म नहीं कर पाई। तो नासिक फिल्म कंपनी ने उन्हें व उनके पति को नौकरी से निकाल दिया।

स्वर्गीय तबस्सुम गोविल जी ने एक बार अपने एक यूट्यूब वीडियो में बताया था कि जब उन्होंने अपने मशहूर शो 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' के लिए लीला मिश्रा जी का इंटरव्यू लिया था तब लीला जी ने उन्हें बताया था कि हीरोइन बनना उनका ख्वाब था ही नहीं कभी। जिस तरह से उनकी परवरिश हुई है, और जिस तरह के संस्कार उन्हें दिए गए हैं, वो कभी किसी पर-पुरुष के साथ रोमांस नहीं कर सकती थी। ना ही किसी और से प्यार का इज़हार कर सकती थी। 
 
बकौल लीला मिश्रा, उन्हें इस तरह की बातें बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए उन्होंने फैसला किया था कि वो सिर्फ़ अच्छे चरित्र किरदार ही निभाया करेंगी। और वैसा ही उन्होंने किया भी था। अपने शुरुआती करियर में उन्होंने भाभी, बहन व कुछ अन्य प्रकार के चरित्र किरदार निभाए। आगे चलकर वो फिल्मों में मोस्टली दादी-नानी के किरदारों में दिखी। और ऐसे ही किरदार निभाते हुए ही लीला मिश्रा जी ने अपनी ज़बरदस्त पहचान कायम की। शोले में बसंती की मौसी का किरदार लीला मिश्रा जी ने कालजयी बना दिया। वो भले ही थोड़ी सी देर के लिए ही शोले में नज़र आई। लेकिन अमर हो गई।

ऐसा नहीं है कि लीला मिश्रा जी ने कभी हीरोइन का किरदार नहीं निभाया। शुरुआत में एकाध फिल्मों में वो बतौर हीरोइन नज़र आई थी। मगर इसी शर्त पर कि वो हीरो के साथ ऐसे दृश्य शूट नहीं करेंगी जिसमें किसी तरह की कोई नज़दीकी दिखाई दे। विकीपीडिया पर ही बताया जाता है कि 1936 में एक फिल्म में लीला जी को बतौर हीरोइन साइन किया गया था। मगर कुछ दृश्य शूट करने के बाद लीला जी ने वो फिल्म छोड़ दी थी। क्योंकि उस फिल्म के डायरेक्टर एक ऐसा दृश्य लीला जी से शूट करने को कह रहे थे जिसमें उन्हें हीरो के गले में अपनी बाहें डालकर कुछ संवाद बोलने थे। 
 
लीला जी की नज़रों में ऐसा करना गलत था। वो किसी पराए मर्द के साथ इस तरह की शारीरिक अवस्था में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। इसलिए उन्होंने फौरन वो फिल्म ही छोड़ दी। कुछ ऐसा ही हुआ था उनके साथ 1936 की ही होनहार नामक फिल्म में। उस फिल्म में लीला जी के अपोज़िट शाहू मोडक हीरो थे। उस फिल्म के एक दृश्य में लीला जी को शाहू मोडक को गले लगाना था। मगर लीला जी ने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया। बाद में उस फिल्म के मेकर्स ने लीला जी को शाहू मोडक जी की मां के रोल में ले लिया। और वहीं से बतौर चरित्र अभिनेत्री लीला मिश्रा जी की फिल्म जर्नी स्टार्ट हो गई। जबकी उनकी उम्र तब बहुत ही कम थी।
 
अपने यूट्यूब चैनल तबस्सुम टॉकीज़ के अपने एक वीडियो में स्वर्गीय तबस्सुम जी ने बताया था कि लीला मिश्रा जी ने एक दफ़ा उन्हें अपने घर खाना खाने के लिए इनवाइट किया था। तब उन्होंने तबस्सुम जी से पूछा था कि तबस्सुम, तू कच्ची रसोई खाएगी या पक्की रसोई? हैरान तबस्सुम जी ने जब लीला मिश्रा जी से पूछा कि ये कच्ची रसोई और पक्की रसोई क्या होती है तब लीला मिश्रा जी ने उनसे कहा था कि तेरी मां तो यूपी से है। क्या उसने तुझे नहीं बताया कि कच्ची रसोई और पक्की रसोई में क्या फ़र्क होता है। अपने वीडियो में तबस्सुम जी कहती हैं कि लीला मिश्रा जी खाने की बहुत शौकीन थी। और पक्की रसोई ही खाया करती थी।
 
लेकिन दिक्कत ये थी कि लीला मिश्रा जी हमेशा पक्की रसोई ही खाया करती थी। नतीजा ये हुआ कि उनका वज़न बहुत ज़्यादा बढ़ गया। वो काफ़ी मोटी हो गई। और वही मोटापा उनकी जान का दुश्मन साबित हुआ। सन 1988 की 17 जनवरी को हार्ट अटैक की वजह से लीला मिश्रा जी का निधन हो गया। जबकी लीला मिश्रा जी पैदा हुई थी 1 जनवरी 1908 को। लीला मिश्रा जी को किस्सा टीवी का नमन। #LeelaMishra #remeberingleelamishra

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