आज साहित्य में नंदन पंडित किसी परिचय के मोहताज नहीं है,उन्हें किसी विधा विशेष में बांध पाना संभव नहीं वह जिस भी विधा में लिखते हैं वहीं उनकी विधा हो जाती है चाहे वह गीत हो,नवगीत हो,कहानी हो,लघुकथा हो या फिर संस्मरण हो.यू तो नंदन पंडित का जन्म गोंडा जनपद के गजाधरपुर गांव में हुआ है,वह बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं लेकिन उनके उपन्यास की यह प्रेम कथा हमे हमारे गांव की उस महुआ और मंजरी के निस्वार्थ प्रेम तक ले जाती है जिसे हम आप शायद कही किसी गांव में छोड़ आए हैं.
इसके अलावा भी उनकी दो प्रमुख काव्य कृतियां (1)अंखुआ (गीत संग्रह)
(2)बोल कबूतर (बाल काव्य संग्रह)
ने अपने पाठकों के हृदय को ऐसा स्पंदित किया है कि इनकी इन दोनों कृतियों के काव्य रस के आचमन का पाठकीय भाव ज्यों का त्यों बना हुआ है.
हमारे उपन्यासों से गांव ऐसा गायब हुआ कि जैसे हम अपने गांव के एनआरआई हो गए हो,लेकिन ऐसे में मुझे एक फिल्म के गीत का वह मुखड़ा याद आ रहा कि--"घर आजा परदेसी तेरा देश बुलाए रे".वैसे गांव को बहुतों ने लिखा लेकिन"प्रेमचंद" और "फणीश्वर नाथ रेणु" ने जो गांव लिखा बस वही गांव जिंदा रह गया, आज भी फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर राजकपूर की "तीसरी कसम" और फिल्मों में "नदिया के पार" कि गुंजा और चंदन को भला कौन भुला सकता है.
गांव की मोहब्बत आज भी महानगरों के लिव इन रिलेशनशिप जैसा नहीं है, वहां की मोहब्बत में सौम्यता है ,शिष्टता है,शालीनता है,शर्म और संकोच हैं,जबकि वही महानगरी मोहब्बत में एक अजीब सी छटपटाहट है, धुंध है, धुआं है,आक्रोश है,जबकि गांव की मोहब्बत आज भी एक दूसरे के लिए आरती का दिया है.
ऐसे में मुझे यकीन है कि नंदन पंडित के इस उपन्यास की भाषा इसके पात्र इसके कथानक "रेती की सौंह" के साथ हमारे दिल के भावों को पत्थर और कंक्रीट से निकाल कर उस संवेदना तक ले जाएंगे जहां कभी हम आपने भी किसी से मोहब्बत की होगी या किसी की प्रेम गाथा किसी के मुंह से सुनी होगी,,,,,,,,
वैसे इस उपन्यास को हाथ में लेते ही ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई मुझसे कह रहा हो---
"इसके हर पन्ने में मेरी सांस है,मेरी नब्ज़ है,
जरा सलीके से पढ़ना मेरे महबूब,
तुम्हें 'रेती की सौंह' है".
No comments:
Post a Comment