लोग
तेरी रूप कुंभ में डूब रहे हैं,
तू मालाएं बेच रही
पर इनके मन का पाराशर भटक रहा
तेरी आंखों की,
आसक्ति त्रिवेणी में
तू श्यामल है,
पर गौर वर्ण से सुंदर है
है कस्तूरी महक
तेरे होने की
तू एक स्वर्ण हिरन है मेले की,
प्रकृति ने भी रचकर जैसे
रख दिया हो
एक नीलकमल तेरी होठों पर.
✍️✍️नोट--सुना है कि कभी पराशर ऋषि सत्यवती के प्रेम में आसक्त हो गए थे.
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