Tuesday, 25 April 2023

मजदूर दिवस के उपलक्ष मे लिखी एक यथार्थ कविता।
                             (पाँव रिक्शा)
चेहरे पे एक थकन--------
होंठो पे सुलगती बीड़ी!
पेट भरने की खातिर----------
सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
तपती डामर की सड़क पे,
हर रोज लिखते है अपनी भूख,
बाबू यही है हमारी जिंदगी,
और सिने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
कभी किसी पुलिसिये की बेज़ा गाली,
बीन किराये के उतरना,
चेहरे पे चंद थप्पड़,
और पसीने से भीगे तर-बतर चेहरे को,
मैले गमछे से पोछना,
फिर आगे बढ़ जाना पिके गुस्सा,
पेट की खातिर---------
सीने से खिचने को पाँव रिक्शा,
बाबू यही है अपना किस्सा।
छोटे बच्चे,बीमार बीबी,टपकती छत,
अपनी घर से दुर खुले आसमान तले,
सुलगती बीड़ी फुटपाथ,
और अपने दाहिने हाथ से,
लोहे की सिकड़ी से बांध लगा ताला,
ठिक सिरहाने सारी रात खड़ा,
मेरी जिंदगी की तरह पाँव रिक्शा।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

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