Tuesday, 25 April 2023

बाबाओ की अय्यासी व उनके रासलीला को लेके बहुत पहले लिखी मेरी एक कविता.
                     
(जापानी तेल लगाओ----राधे माँ)

तुम भी अब स्वर्ण-भस्म और शीलाजीत सी-------
कोई दवाई खाओ---राधे माँ।
बर्दाश्त नही हो रहा आशाराम और राम-रहिम से,
स्याह कोठरी का खालीपन,
किसी बगल की बैरक मे कैसे भी हो-------
तुम आ जाओ--राधे माँ।
स्त्री-गामी संसर्गो का स्वर्ग छिना,
नरक हो गया जीवन,
इस जीवन की रति-सुंदरी कि काया का------
कुछ तो दरस कराओ--राधे माँ।
हम बाबाओ के अच्छे दिन चले गये,
मालिश,काजू ,पिस्ता सब ख्वाब हुआ,
आश्रम मे पोर्न बहुत देखा,
कही नपुंसक न हो जाये हम बाबा,
अपने प्रेम का कुछ दिन ही सही,
तुम आके यहाँ गुजारो--राधे माँ।
सारे आसन कामुकता के फिर से जीवित हो,
तुम भरके हथेली मे अपने थोड़ा सा,
ये जापानी तेल लगाओ--राधे माँ।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.------7800824758

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