मैं कुल्हड़ हूँ,
मैं इतनी खूबसूरत
और सुघर
यूँ हीं नहीं हूँ,
मुझे मेरे कुम्हार नें --
पसीने से तर-ब-तर भीग,
बड़ी मेहनत से गढ़ा है,
फिर सुखने के लिए
इसने घंटो कड़ी धूप में रख
मेरी रखवाली की,
सुख जाने पे,
मेरे कुम्हार ने ---
एक एक कर
बहुत प्यार से मुझे उठाया
ताकि मैं कहीं से
फूटूं न ,उसी प्यार से फिर मुझे
मेरे कुम्हार ने,
आवें मे रख मुझे पकाया
और फिर आवें से निकाल
उसनें मुझे तका
और पूछा, बता तूं ,
कैसी है??
मैंने भी ---
अपने कुम्हार से कहा,कि
तेरी कला ही कुछ ऐसी है, कि
क्या कहूँ??
बस !तू इतना समझ ले,
मेरे कुम्हार ,
मैं पहले सी खूबसूरत
और सुघर हूँ.
मैं कुल्हड़ हूँ.
@@Rangnath Dwivedi..
No comments:
Post a Comment