Sunday, 30 April 2023

बीते हुये बचपन की एक कसक------------
                         (चुरन और इमली)
स्कूल की छुट्टी के समय--------------
जब अपनी छोटी बिटिया की अँगुली पकड़े लौट रही थी,
तो अचानक------------
वे अपनी नन्ही अँगुलियो को छुड़ा बहुत खुश हो उछली,
तो देखा सामने लकड़ी के गुटके में,
रंखे बेच रहा था एक बुढ़ा-------------
चुरन और इमली।
मेरी जेहन में-----------
वे बचपन के चटखारे याद आये,
मै भी तो एैसी ही थी बिल्कुल अपनी छोटी बिटिया सी,
लेकिन समय के पंख के साथ,
सब कुछ बदलता गया,
और न चाह के भी बड़ी होती गई,
इत-उत उड़ने और खुश रहने वाली----------
ये बचपन की तितली।
फिर बेटी ने झिझोड़ मम्मी-मम्मी कहां तो मेरी तंन्द्रा टूटी,
पर्स से निकाल उस इमली वाले के पैसे दे,
घर चल पड़ी------------
और रास्ते भर खाती रही अपने में मस्त हो,
उसी चटखारे के साथ,
जैसे कभी मै खाया करती थी एै"रंग"---------
ये चुरन और इमली।

@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

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