Wednesday, 5 April 2023

(नेता जी)

चुनाव में----
हार के डर से,
बहुत घुट रहे---
नेता जी.
इसीलिए !
जरूरत से कहीं ज्यादा
झुक रहे----
नेता जी.
कल तलक बड़ी ऐठन थी,
दिखना मुहाल था,
आजकल----
गांव-गली, जवार मे,हर कहीं,
दिख रहे----
नेता जी.
खाने-पीने की सुध नहीं,
चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-ब-तर हो,
अन्दर ही अन्दर, 
बहुत फूंक रहे----
नेता जी.
मन्दिर-मस्जिद में नवां रहे शीश,
कल तलक,
जिस दलित से चिढ़ते थे,
आजकल----
उसी की बस्ती
और घर मे भोजन कर,
कुछ देर रुक रहे----
नेता जी.

@ रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी

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