(छत्तीसगढ़ सुकमा और हमारे शहीदो के तीन सौ कातिल)
मै किसी भी राजनैतिक पार्टी पे किसी भी प्रकार का दोषारोपण नही करता और नही उनके राष्ट्रभक्ति पे सवाल उठाता हूँ।लेकिन मेरे साहित्य के संवेदना की वे आँख भर आती है,जो आँख किसी माँ के उस एकलौते शहीद बेटे को देख व उसके चित्कार को सुन बिचलित से हो जाते है।
जब कोई रोती हुई बहन आँख मे आँसू लिये अपने एकलौते शहीद भाई कि वे कलाई टटोलती है"जिसपे अब तलक उसने अपनी संवेदना की राखी का न टुटने वाला वे डोर बांधा था"।
उस शहीद के पत्नी की पथराई उम्मीदे जिसके आँखो से आँसू भी नही टपकते बस वे एकटक"तिरंगे मे लिपटे अपने उस शहीद पति को तकती है उसका ये तकना मेरे इस साहित्यिक हृदय को-----उन नक्सलियो के गोली की तरह भेद देती है"।
उस शहीद के बुढ़े बाप को देखो जिसके बुढ़ापे मे स्वस्थ रहने के चर्चे पुरे गाँव मे थे"आज उसी को अपने चार वर्ष के पोते को पकड़ कंपकपकता देख के लग रहा कि आज उसकी पिड़ा विश्व की सबसे असह्य पीड़ा है"।
ये एैसी पीड़ा है जहां मेरे लेख के शब्द गौड़ और मौन है।
ये हमारे देश की एक बड़ी दुखांत विडंबना है कि हम अपने ही घर,देश और राज्य मे"तमाम तरह के शौकिया कैंसर पालते है"।
गौर करेंगे तो ये नंगे,पुरी आजादी के साथ राष्ट्र,राष्ट्रगान और राष्ट्र ध्वज को अपमानित करते हर कही दिख जायेंगे,हां कभी इनका विरोध बस कुछ
तथाकथित विद्वानो तक सिमट कर रह जाता है फिर अगली कोई एक नई घटना होने तलक ये मौन साध लेते है अर्थात अपने धैर्य और संयम के उस बस्ते मे डाल लेते है"जिसमे पहले से ही हमारी नपुंसकता के बेगैरत तमाम समान पहले से ही एक रद्दी के न खुलने वाले गट्ठर की तरह पड़े है"।
अगर एैसा न होता तो छत्तीसगढ़ का वे सुकमा जहां बाइज्जत और बेखौफ हमारे सीआरपियफ(C R P F) के जवानो का कत्ल होता है और हमारी सियासत रटे-रटाये कई सालो के वे--"धैर्य के जुमले को जब अपने होंठ खोल इस्तेमाल करती है तो लगता है कि------एक मर्तबा और हमारे देश के जघन्य और क्रुरतम नक्सली कातिलो की विजय हुई"।
इस हृदय विदारक घटना से,मेरे मानस पटल पे कुछ न समझ आने वाले प्रश्नो का रेखांकन होता है वे प्रश्न पीड़ित से रह जाते है!क्योंकि उसके उत्तर के मूल में हमारे सरकार की न समझ आने वाली वे शक्ति है जिसका हमने कभी भी इस्तेमाल होता नही देखा।
"वे शक्ति है इच्छा शक्ति जिसे अगर सरकार चाहे तो इतना बाखूबी इस्तेमाल कर सकती है कि भविष्य में----हमारे ही आस्तीन के ये तीन सौ नक्सली साँप कभी भी देश के किसी भी सुकमा के जंगल मे खो नही सकते"।
मै दावा करता हूं कि वे तीन सौ नक्सली अब भी हमारी सरकार की उस रडार पे है"जहां इनकी रीढ़ को तोड़ हमेशा के लिये पंगु किया जा सकता है,क्योंकि एक,दो नही ये तीन सौ है!जो किसी मैजिक से नही बल्कि योजनाबद्ध बुलाये व गोलिआये गये है"।
मै अपने लेख से ये गारंटी और दावा करता हूं कि छत्तीसगढ़ के उस सुकमा मे अब भी मेरे जवानो के तमाम कातिल होंगे।
हे!मेरे देश की सियासत इन शहीदो की शहादत-----"का यलगार लो इन्हें केवल तुम्हारें नम आँखो की विदाई या वे तीस लाख का चेक नही चाहिये जिसे तुम आज कितने वर्षो से दे रहे हो"।
"हाँ अगर दे सकते हो तो तिरंगे में लिपटे उन तमाम शहीदो की रुह और आत्मा को वे मादरे शुकून दो जिसके लिये-------हमारे देश का जवान बड़ी फक्र और मोहब्बत से शहीद होता है"।
@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-------7800824758
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