ठंड के मौसम की संवेदना पे लिखा लेख---------
( अलाव )
हमारे शहर,तहसील और बाजारों के फुटपाथों पे जब बीना किसी शाल के ठंड से अकड़ी 20-30 लाशे मिलती है तो पहली बार---" अखबारों को थोड़ी सी गर्मी प्राप्त होती है और अखबारी जमीर की वही गर्मी इनसे थोड़ा बहुत दो-तीन दिन सच लिखवा लेती है, फिर यही सच की गर्मी शहर के कुछ नामचीन लोगों व सरकारी लोगों तक पहुचती है".
ये गर्मी चंद चौराहे के जलते हुये अलाव मे परिवर्तित हो जाती है,इसे तमाम सरकारी अमले अपनी उपलब्धियो मे गिनाने मे लग जाते है. सर्वविदित है कि पुरी दुनिया मे कागज की लिफाफेबाजी मे मेरे इस देश का कोई जवाब नही. " और ठंड के मौसम मे भी ये लिफाफेबाजी उसी पुराने गोल्डेन लुक मे दिखती है". आप जब अखबार उठाके पढ़ेंगे तो--"फुटपाथ पे ठंड से मरे गरीब, असहाय लोग किसी भी प्रकार के ठंड से नही मरते ऐसा हमारे यहाँ के अलौकिक डाक्टरों का कथन है".
वैसे भी हमारा ये वृहद देश--"अपनी वेदना का चरम जीता है,उसी एक चरम वेदना का एक नाम है यहाँ की पड़ने वाली भयंकर ठंड़". और कुछ तथाकथित पहुंच वाले लोगों के चौराहे पे जलवाया गया ये अलाव, हां कुछ स्वयंसेवी संस्थायें या बड़े स्तर के अधिकारी बीच-बीच में कंबल वितरण कर कुछ तो इन गरीबो-असहायों की ठंड से बचने भर की एक अल्प ही सही व्यवस्था करा देते है.
चाहे कुछ भी हो पर चौराहे पे जलवाई गई ये लकड़ी--"जब शहर के लोग अपने-अपने सुसज्जित कमरो में जाके सो जाते है तो, चौराहे पे अलाव की यही लकड़ियां आवारा पशुओं और फुटपाथों पे अपनी नंगी आँखों से जी रहे इस ठंड व ठिठुरन को अपने से दुर कर आने वाले कल की सुबह का दर्शन कर पाते है.
यही वे है जो हर मौसम का आहुत जीवन जीते है इनके लिये---"रैन-बसेरे और अलाव किसी भी सुखमय विश्वठहराव की तरह है". आइये हम अपने इस लेख से आपकी वेदना को एक आवाज़ लगाते है कि अगर मालिक ने आपको इस लायक किया है कि इस कपकंपाती ठंड मे कही आप अलाव जलवा सके तो छुट्टे व अवारा पशु, बीना किसी शाल स्वेटर के फुटपाथ पे टहल रहे चंद पागल को कुछ महिनो के अलाव की तपिश दे दो साहब"
@@@रचयिता--रंगनाथ द्वीवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin no.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758
यह लेख मेरा स्वरचित व अप्रकाशित है.
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