Thursday, 29 December 2022

(उत्तर-प्रदेश का चुनाव यानी सियासत के छज्जे पे खड़ी द्रोपदी)
उत्तर-प्रदेश के आगामी चुनाव की अग्नि अब जल चुकी है,धुँये उठ रहे है,ये धुआँ संप्रदाय का है,जाति का है।तमाम दबी इच्छाये,अंतरकलह,अपनी जुबान से इस चुनावी समर मे ब्यक्त होंगी।चाचा,भतीजे,भाई,बाप,परिवार हासिये पे दिखेंगे!क्योंकि राजनीति के कौरवो और पांडवो को अब सियासत के छज्जे पे----अपने स्वार्थ की द्रोपदी,गिले बालो को खोल खड़ी दिखने लगी है।
ये द्रोपदी लखनऊ सी हस्तिनापुर को ढ़ेरो ताने मारेगी,तमाम दुर्योधनो के सीने चाक करेगी,जिसके फलस्वरूप आज का धृतराष्ट-गांधारी अंधे हो उठेंगे।लेकिन ये कलयुग की द्रोपदी अब केवल कुछ पाशो मात्र से नही जिती जायेगी और ना ही राजतंत्र के दूशासन की तरह अपनी रजस्वला काल मे भरी सभा मे साड़ी खिच नंगी की जायेगी।
क्योंकि ये द्रोपदी आज के लोकतन्त्र की स्वार्थ प्रिया है,ये अपने लिये किसी कृष्ण का आवाहन नही करेगी!हां इसे अगर आज के दुर्योधन या दूशासन इसके अनुकूल दिखे तो सत्ता सुख की खातिर,प्राचीन सिद्धांतो को छिन्न-भिन्न कर ये स्वयं दुर्योधन या दूशासन की जांघो पे जा बैठेगी।
हां कुछ तथाकथित लोगो के खुद और परिवार की लड़ाई ने,एक योग्य मुख्यमंत्री को बिचलित सा कर दिया है,क्योंकि वे अर्जून की तरह आज मात्र अपने लक्ष्य अर्थात मछली की आँख नही बल्कि उन आँखो से असहाय हो अपने चाचा और पिता को देख रहा है।एक योग्य युवा मुख्यमंत्री अपने पिता और चाचा के सियासी तीर से बुरी तरह बिंध गया है।
आज उसको पालने वाले,अपनी गोद मे खेलाने वाले चाचा एक-एक कर उसके द्वारा दी गई प्रत्याशीयो की सुची से वैसे ही नाम काट रहे है-----जैसे कभी महाभारत के युद्ध मे पालने-पोसने वाले अपने ही बच्चो को मार काट रहे थे।
लेकिन इस युद्ध के चक्रव्युह को आज के इस अर्जून को तोड़ना होगा!मोह माया का त्याग कर इस झंझावत से निकल एक नये समाजवादी युग की रचना करनी होगी।
तभी आज के सियासत की पांचाली अर्थात इस उत्तर-प्रदेश के छज्जे पे अपने बाल खोल खड़ी एकटक तक रही द्रोपदी अब स्वमेव किसी अर्जून को बहका तो सकती है----लेकिन वरण कर ये उसे ही सत्ता के सुहाग सेज तक ले जायेगी जो उसे पांचाल अर्थात स्वार्थ की बिसात पे बिछे शकुनी के मोहरो को बुरी तरह मात दे उसे पाँच सालो तलक विहंगम सत्ता सुख दे सके।
हे!पार्थ अखिलेश उठो साबित करो कि इस लोकतन्त्र की सामरिक गीता----वासासि जिर्णानी,यथा विहायः नही बल्कि जनमत और लोकतन्त्र के उन मतो से लिखी जायेगी जो यहां की जनमानस की चेतना के बौद्धिक इंकलाब से निकलेगा।
और आजकी ये कलुषित द्रोपदी फिर अगले चुनाव तक इस उत्तर-प्रदेश की सियासत के छज्जे पे एक आघात लिये अपने गिले स्वार्थ के बालो को खोले खड़ी रहे!इसी मे आज की हस्तिनापुर अर्थात उत्तर-प्रदेश की जनता व आवाम का संपुर्ण सुख निहित है।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

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