Saturday, 17 December 2022

(ईट भट्ठे पे काम करती औरत की यथार्थ गाथा)
गरीबी वे औरत है-------------
जो किसी ठाकुर के ईट-भट्ठे पे काम करती है।
इसे अपने यौवन उभारो का कोई सौंदर्य बोध नही,
कौन तकता है?कौन नही,
वे इससे बेखबर-----------
अपने जंगली फूलो से आँचल हटा,
शाम की रोटी का इंतजाम करती है।
इसका पती बुधुवा ब्याह के लाया,
तभी से इसके नथुनो को आदत सी पड़ गई,
कच्ची देशी शराब के उबकाई वाले भभके की,
इसने भी अब आदत सी डाल ली है-------
अपने पती से बलात्कार की तरह से मिलने वाले प्यार की।
ये कमो-बेस हर भट्ठे की दास्ता है,
महिने मे कुछ राते भट्ठे का मुंशी,कुछ राते--
ठाकुर अपने बनाई कुटिया मे काटता है!
लेकिन काम करने वाली औरत कुछ नही कहती,
वे जानती है इसका परिणाम।
इसे तो अपने बच्चे की वे पहली डिलिवरी,
भट्ठे की याद है------------
जब ठाकुर की दरियादिली ने उसे,
बीना ईट पाथे भट्ठे पे काम किये------
महिने भर का राशन कुछ पैसे दिये थे!
सच तो ये है---------
कि इस बच्चे के जन्म के पहले की माहवारी में,
इसके साथ कुछ राते ठाकुर ही सोया था।
ईट-भट्ठे की चिमनी से निकलता धुआँ
और उस धुँये का कालापन----------
ने इसे धीरे-धीरे अपनी चपेट मे ले लिया,
अब ये भी होंठो पे बीड़ी सुलगा-------
कुछ धुँये उगलती है भट्ठे के चिमनी की तरह,
फिर उठ चल देती है।
मेरी कविता ने भी देखा है अक्सर उस गरीब औरत को,
जो पुरे देश मे किसी न किसी भट्ठे पे,
अपने जंगली दो खिले फूलो से आँचल गिरा के---------
ईट पाथने का काम करती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
## # शायद हर किसी ईट भट्ठे पे कुछ एैसी औरते आपको अपने मे खोई जंगली फूलो से अपना आँचल गिरा ईट पाथती दिख जाये।
@@@धन्यवाद!आपका निर्मेश के त्यागी भईया जो आज के वर्तमान अंकुर मे आपने हमारी यथार्थ रचना को अपना प्यार व दुलार दिया।

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