Tuesday, 27 December 2022

(पुस की रात)
कहाँ कटती है-
फटे कंम्बल से,ऐ शहर गाँव मे,
पुस की रात।
हाँड़ कंप-कपाती ठंड मे,
कहाँ देख पाता है-शहर
खेत के किनारे पडे किसी-
किसान की लाश।
अखबार की बे-शरमी है,रंग-
वरना गाँव मे आज भी है,वही ठंड
और वही प्रेमचंद के-
               पुस की रात।

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