(भाई के बांधे चीर पर)
जुये में द्रोपदी को हारकर--
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा--
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर.
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर.
दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी---
तब बहन की पीर पर.
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में-----
अपने भाई को बांधे चीर पर.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
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