Saturday, 19 August 2023

(सौतन बांसुरी)

दैनिक भास्कर के "अहा! जिंदगी" के एक पुराने अंक में प्रकाशित मेरी कविता "सौतन बांसुरी".

(सौतन बांसुरी )

रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बांसुरी.

रह-रह के हँसती है,
हमारे दर्द पे,
तो लगती है,
हमको---
सौतन बांसुरी.

उफ!
उन पर भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें 
हम बेचारी गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है 
खुद,
हम गोपियों के-----
नारायण बांसुरी.

काश! मिलती तो 
इसे हम तोड़ देती,
पर ये लगता है,
कि संभव ही नही,
बड़ी बेहया,
बड़ी निर्लज्ज है,
ये सौतन बांसुरी.

अधर तो अधर था,
कमर मे लटक के भी उनके,
हमारे जी को 
जलाती है 
ये सौतन बांसुरी.

रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758

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