आज देश व राज्य की समस्त राजनैतिक पार्टियाँ--"अपने-अपने गले में स्वार्थ का फटा ढोल टांगें, 'राग-प्रधानमंत्री' गाने मे मशगूल है". जबकि सच्चाई ये है कि--"ये सभी बेसुरे जिस सुर को साधने मे लगे है वे सुर इनसे सध पायेगा ये बड़ा मुश्किल है क्योंकि इनके इन फटे ढोलों मे ना कोई राग है और न ही कोई शास्त्रियता". ये बस बिना किसी सुर लय के फकत फटे ढोल पीट रहे है,सच तो ये है कि इनका ये फटा ढोल एक प्रतीक मात्र है बाकी ये सभी "राग-प्रधानमंत्री" गाने के चक्कर मे--"ढोल कम और अंदर से अपनी-अपनी छाती ज्यादा पीट रहे है".
इन्हें भी ये भान है कि अब "राग-प्रधानमंत्री" बनने की सिद्धहस्त किताब--नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के हाथ लग गई है. ये किताब कभी पीढ़ियों से एक ही परिवार के हाथ मे रही--" वे स्वर्ण परिवार काग्रेंस का था इस स्वर्ण परिवार के अयोग्य धुरंधर राहुल गाँधी इस सिद्ध किताब को सहेज नही पाये". किताब छिन जाने के बाद जब इनको थोड़ा बहुत होश भी आया कि फिर से ये खानदानी किताब इनके पास आ जाये--"तब तक ये "राग-प्रधानमंत्री' की किताब इनसे छिने अमित शाह और नरेन्द्र मोदी जैसे घाघ के हाथ लग गयीं और इन दोनो ने मिल के इन्हें अघोषित तरिके से एक अंतरराष्ट्रीय पप्पू साबित कर दिया'. इसमें ये दोनो ही इतने सफल हुये कि अब तो लगता है जैसे राहुल गाँधी इनके इस बिछाये हुये जाल मे इतने गहरे तक उलझ गये है कि इनका इससे निकलना मुश्किल दिख रहा. यही कारण है कि उनकी कुछ हरकतें उनके फ्रस्ट्रेशनग्रस्त होने की गवाही भी दे रहे.
आज काग्रेंस के हालात इतने बद से बदतर हो गये है कि,छोटी से छोटी पार्टियाँँ भी उसे मुँह लगाने को तैयार नही,सच तो ये है कि--" ये पार्टियाँँ
भी एक शापित राजकुमार के साये से डरती दिख रही है". जबकि कभी ये " राग-प्रधानमंत्री" जब---"काग्रेंस के राज-दरबार मे गाये जाते थे तब चाटूकारिता के इन कलाकारों से ये हूनर और ढोल वही रखवा लिये जाते थे". कभी अगर किसी ने इस राग का अन्यंत्र रियाज भी करना चाहा या ये ढोल बजानी चाही तो इसका खामियाजा इन्हें भरपूर भुगतना पड़ा.
लेकिन आज हर पार्टी के लोग ये जानते है कि एकबार ये सुअवसर फिर आया है कि ढोल और "राग-प्रधानमंत्री" शायद इनके हाथ लग जाये लेकिन ये महागठबंधन की बिषबेलरी बस पानी के बुलबुले के सिवा तो हमें कुछ न लग रहा.ये सभी चुनाव के इस स्वयंबर मे भाग तो लेंगे इस स्वयंबर मे भाग लेने का इन्हें लोकतांत्रिक अधिकार भी प्राप्त है,ये सभी अपनी-अपनी सफलता का "राग-प्रधानमंत्री" इन्हीं फटे ढोलो से पीट-पीटकर गायेंगे लेकिन वे इसमें सफल होंंगे ये शक है क्योंकि अब वे "राग-प्रधानमंत्री' की किताब व वे ढोल दो महा घाघो यानि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के सुर ,लय, ताल के कब्जे मे है.अब तो बस यही है कि पीटो ढोल बजाओ छाती क्योंकि 2019 के चुनाव की बाजी का सेहरा भी जहां तक मुझे अंदेशा है एक मर्तबा फिर--" इन्हीं दोनो "राग-प्रधानमंत्री" के महाशातिरो नरेन्द्र मोदी;अमित शाह यानि सफलता के तानसेन और बैजु-बावरा के हाथ आनी है".
@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियाँपुर
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (उत्तर-प्रदेश).
Mo.no.---7800824758.
यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
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