Thursday, 31 August 2023

(अमृता प्रीतम)

(अमृता-प्रीतम)

मेरे इमरोज़--
मै तुम्हारे लिये छोड़े जा रही,
एक तकिया तेरे नाम.

काश ये गिलाफ-
मै तुमपे चढ़ा पाती,
और बिछा पाती
अपनी युवावस्था में--
एक बिस्तर तेरे नाम.

तुम मिले भी तो यु मुझसे,
कि जब जीवन की शाम--
के चंद धुंधलके ही मेरे पास बचे थे!
माफ!करना क्या करु?
बहुत जलाना चाहती हूँ---
तेरे अंदर रौशनी के लिये,
पर बुझ जाऊँगी--
मै बनके दिया एक शाम.

मेरे इमरोज़---
तुम मेरे और पास आओ,
टटोलो मुझको
मैने बहुत कुछ लिखा है,
लेकिन---
इस अमृता प्रीतम का अधुरापन पढ़ो,
पढ़ पाये नही न!
जानती थी नही पढ़ पाओगे,
लो मेरी आखिरी साँस,
और आखिरी हिचकी,
खुद लिखे जा रही
एक आखिरी किताब---
"अमृता प्रीतम और उसका
अधुरा इमरोज़'.

रचयिता--रंगनाथ द्वीवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no-----7800824758

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