Tuesday, 29 August 2023

(इतना दर्द ना हो)

(इतना दर्द न हो)
मै गा तो रहा हूँ-----------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में-----
इतना दर्द न हो।
ना कोई टूट के बिखरे मेरी तरह,
फिर किसी को अपनी शाखे मुहब्बत से,
यू जुदा होने का एै खुदा----------
इतना न दर्द हो।
चुभे कमरे की खुली खिड़की से,
याद की हवा,
एै खुदा फिर किसी खुली खिड़की का मौसम------
इतना सर्द न हो।
चेहरे की सिलवटे चुभन न छिप सके,
एै खुदा किसी चेहरे पे-------
इतना गर्द न हो।
मेरी तरह न बुझ जाये सहर से पहले,
एै खुदा किसी और चराग को सब का----
इतना दर्द न हो।
मै गा तो रहा हूँ---------
लेकिन एै खुदा मेरी तरह,
फिर किसी के गज़ल में----
इतना दर्द न हो।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
mo.no.-----7800824758

इस रचना मे दो एैसे शब्द है जिनका अर्थ निम्नवत है-----
(1)----सहर----सुबह।
(2) सब----रात।

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