आज भी गूंज रही है
मोहब्बत के चबूतरे पे,
ए विस्मिल्ला खाँ
तेरी शहनाई.
नही भुले है
"बनारस" के सभी घाट,
तेरे पान से रंगे होंठ पे
वे तेरा अक्खड़पन भाई.
देखो "दशहरे" की आँख नम है,
उदास है "नाटी इमली!"
और गमगीन है
"मोहर्रम"भाई.
लौट आओ फिर से,
हम हिन्दुओं के "राम-राम"
और मुसलमानो के
"विस्मिल्लाह भाई".
रचना-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
mo.no.7800824758
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