(सौतन बाँसुरी)
रहती है, हर पल अधर पे,
हम गोपियों की------
सौतन बाँसुरी.
रह-रह के हँसती है,
हमारे दर्द पे जब,
तो हम गोपियों को लगती है,
सौतन बाँसुरी.
उफ! उनपे भी गुस्सा आ रहा,
पर क्या करें हम गोपियाँ??
हमें भुलकर,
कितने मजे से छू रहे है खुद,
हम गोपियों के-----
नारायन बाँसुरी.
काश! मिलती तो इसे हम तोड़ देती,
पर ये लग रहा, संभव नही,
बड़ी बेहया,निर्लज्ज है,
अधर तो अधर था,
कमर मे भी खुस के उनके,
हाय! कितनी खुश हैं,
ऐ "रंग" ---
ये डायन बाँसुरी.
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
@@@रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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