Monday, 5 February 2024

(उन्मुक्त होना चाहती हूं)

(उन्मुक्त होना चाहती हू)
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
जीना चाहती हु मखमली पल,
भरना चाहती हू फिर----------
हिरनी के मेमनें की तरह कुलांचे,
और पियराई सरसो के बीच,
फिर खड़ी होने की चाह,
वे बासंती हवा का श्पर्श,
फिर शर्म की सिहरन से शर्माई आँखे,
अपनी थरथराती--------------
हथेली से ढकना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
इधर-उधर लापरवाह से वे खुले बाल,
वे बीना ओढ़नी----------
खेतो की मेड़ो पे चलना,
बीना किसी डाट,बीना किसी डर के,
एै जिंदगी------------
मै फिर से अपनी साँसो में,
वही बचपन बोना चाहती हू।
मै फिर से बचपन की तरह-------
स्वछंद और उन्मुक्त होना चाहती हू।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758

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