सरहद से नही लौटा,
एक नई दुल्हन का वही दिल रह गया.
सीने पर थे, गोलियो के निशान,
उसकी खुली आँखो मे,
लहराता तिरंगा और करगिल रह गया.
माँ भुलती नही जार-जार रोती है,
उसे गम नही,
अपने एकलौते बेटे की शहादत का,
उसे गम है कि सरहद के उस तरफ,
तमाम साँप--
और उन साँपो का बील रह गया.
राखी के दिन बहन उसकी---
बंद कमरे मे सुनती है राष्ट्रगान,
और फक्र करती है
अपने उस भाई पर
ऐ "रंग"----
जिसकी वजह से
हिंद के नक्शे में करगिल रह गया.
यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं.
रचनाकार--- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com
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