बीसों बसंत मै सजी---
पोर-पोर गदराई, खुद को देख-देख,
बीसों बसंत मै सजी.
कोयल हुई बाँवरी-
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल, महुवे को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग---
बीसों बसंत मै सजी.
यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी,
मेरी पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम----
कोई ऐसी बान मारो
कि आये बाबुल के गाँव,
मेरे पिया की डोली
और मै बैठ चलूं उसमे, अपने पिया के गाँव,
बीसों बसंत मै सजी.
वे घूँघट उलट के देखे मै शर्म से गडु,
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और उस कंपकपी की रात को,
मैं अब तलक सहेजे,
अपने बीसों बसंत जिलूं.
यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com
मादक बसंत।
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