कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
वे मेहंदी लगाये,शादी के जोड़े मे खुद को छिपाये----------
मेरी बेबसी पे हँसी जा रही।
कुछ जली...................
है उसकी विदाई अपने बाबुल के घर से,
वे नया घर बसाने-------------
मेरा घर जला के चली जा रही।
कुछ जली...................
रोको कोई दो वास्ता उसको मेरी वफा का,
हाय!ठुकराके मेरे अश्को की मेहर---------
वे बेवफ़ा क्यू चली जा रही।
कुछ जली.....................
मै जिऊँगा भला अब किसके सहारे,
मेरी साँस थमने लगी है ये देखो------
वे मेरी लाश छोड़े चली जा रही।
कुछ जली..................
एै"रंग" लिख दे तु अब गज़ल मे कफ़न,
क्योंकि वे कफ़न भी संगदिल लिये जा रही।
कुछ जली जा रही,कुछ बुझी जा रही,
मै चुप हूं-----------
मेरी दुनिया लुटी जा रही।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758
शुक्रिया!दैनिक वर्तमान अंकुर,निर्मेश के त्यागी भईया एक अलहदा किस्म की रचना को स्नेह देने के लिये।
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