कभी अंजली को गांव में देखी गई हिंदी फिल्मों ने महानगर की इन बड़ी-बड़ी इमारतो और उसकी चकाचौंध का इतना दीवाना बना दिया था कि--वे जिस गांव में पली बढ़ी थी वही गांव उसे पिछड़ा और बैकवर्ड दिखने लगा था. यही वे दीवानगी थी जिससे अंजली अंदर ही अंदर अपने गांव को पीछे छोड़ती जा रही थी. अंजली की खुशी का कोई पारावार ना था मानो उसके अरमानो को पँख मिल गये थे जब उसकी शादी महानगर के लडके से हुई और वे बिदा होकर महानगर आ गई.
अंजली के कुछ दिन कैसे बीत गये ये उसे पता भी नही चला, लेकिन फिर रोटी की जरूरत, प्राइवेट जॉब को बचाये रखने की जरूरत इन्हें ऑफिस ले जाने लगी. इनके ऑफिस जाने के समय जब मुझे वक़्त मिलने लगा तब मै इन ऊंची ऊंची इमारतो भागती-दौड़ती जिंदगी को घंटो खिड़की खोलकर समझने व पढ़ने का प्रयास करने लगी. तो पाया कि ये बड़ी-बड़ी इमारते तो मेरे कल्पनाओं में रची-बसी फिल्मों की इमारते नही बल्कि ये तो कंक्रीट की इमारते है. जिसमें बस सांसे आती जाती है संवेदना नही और ये संवेदना धीरे-धीरे कब पति-पत्नी के रिश्ते को भी निगलती चली जाती है ऐसा मेरे साथ भी होना शुरू हो गया.
ये थके-मादे जब फ्लैट में अपनी ड्यूटी से लौटते तो अंजली को यूँ लगता कि जैसे ये अपने पाँव रख नही रहे बल्कि घसीट रहे हो. फिर थकी-मादी ऊबन और एक निश्चित रूटीन की तरह उठे खाये-पिये फिर एक कंक्रीट की तरह संवेदनहिन कभी छुआ, कभी नही छुआ ये रिश्ते की भयावहता या महानगर की शुरुवात भर थी. यहाँ--"सांस से लेकर व्यक्ति का बदन तक कंक्रीट है और इस कंक्रीट में ढलना और जीना व्यक्ति की मजबूरी ". इन फ्लैटो की कंक्रीट में एक चीज जरूर चुभती है वे है सुखी न रह पाने की नागफनी.
आज जब वे ऑफिस गये तो मै प्रतिदिन की तरह आज भी खिड़की को खोलकर कुछ सोचने बैठी तो बार-बार मेरी जेहन में वही गाँव उभर रहा था और मै बार-बार उस बैकवर्ड और पिछड़े गाँव को याद करके अंदर ही अंदर कराह उठ रही थी. जिस गाँव को मै पिछड़ा व बैकवर्ड कहकर उपहास उड़ाती थी या नाक- भौह सिकोड़ती थी वे मेरा गाँव इस कंक्रीट के जंगल या इमारतो से कही बेहतर था, जहाँ जिंदगी थी. सच में मै कितनी अभागी थी जो अपने गाँव की संवेदना का दिल दुखाकर इस कंक्रीट के शहर में आ गई.
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
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