व्यंग्य--(ऐतिहासिक उल्लुनामा)
हमारे देश मे इधर कुछ वर्षो से शायद ही कोई ऐसा महिना बीता हो--"जब कोई ना कोई एक बड़ा उल्लु ,किसी ना किसी क्षेत्र का बरामद न हुआ हो". लेकिन इन उल्लुओं के साथ मेरे हिसाब से वे न्याय अभी तलक नही हो पाया जोकि इनके साथ होना चाहिये था,जिसके वास्तविक हकदार ये उल्लु थे.आइये हम-आप और हमारे देश की सरकार दोनो मिलकर "इन तथाकथित श्रेष्ठ उल्लुओं के साथ न्याय करे अर्थात इन्हें भी वे सारी सुख-सुविधाएं मुहैया कराई जाये जो पूर्व में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों को कराई जाती है".
अतः इन बरामद और रंगेहाथ पकड़े गये उल्लुओं को हम दिवाली के शुभ-अवसर पर "राष्ट्रीय उल्लु" के खिताब से सुशोभित करे पुरस्कृत करे.इन उल्लुओं मे से अगर श्रेष्ठ उल्लु का चयन करने मे कोई दिक्कत हो,तो पुरे देश मे मौजुद उल्लुओं से इनके चयन की वोटिंग करवा ले, क्योंकि--"मेरे अंदेशात्मक जनगणना के अनुसार, हमारे पुरे देश में उल्लुओं की संख्या कई करोड़ होगी" जोकि विश्व के किसी छोटे-मोटे देश की जनसंख्या से भी ज्यादा होगी.i
हम इन "राष्ट्रीय उल्लुओं" का चयन विभिन्न क्षेत्रो से भी कर सकते है.ऐसे ही एक चर्चित और ख्वातिलव्ध क्षेत्र बाबागिरी या स्वामीगीरी का भी है. "लक्ष्मी इन उल्लुओं पे अतिशय मेहरबान भी है अर्थात इनके आश्रम मे सावन की तरह बरस रही है".बाबाओ में से किसी एक को "राष्ट्रीय उल्लु" चुनना बड़ा कठीन है,क्योंकि इन बाबाओं मे से "कोई उन्नीस उल्लु नही है,सभी बीस उल्लु है".ये पुरस्कार मेरे हिसाब से आशाराम बापू,नित्यानंद स्वामी और राम-रहीम को सामुहिक देनी होगी. क्योंकि इन्होंने ही बाबाओं मे पाये जाने वाले श्रेष्ठ उल्लुओं का सर्वाधिक संम्मान बढ़ाया.
उल्लुओं का जिक्र हो और राजनीति के उल्लु छुट जाये या रह जाये,ऐसा हो ही नही सकता,क्योंकि--"उल्लुओं की सबसे अच्छी नस्ल नेताओं मे ही सर्वाधिक पाई जाती है" यहां उल्लु केवल मिलते ही नही बल्कि ये बीच-बीच में अपना उल्लु भी साधते रहते है. हर पार्टी में ऐसे उत्कृष्ट उल्लु है,सच पुछिये तो-"उस पार्टी की जो भी राजनीतिक उपलब्धि या हासिल है वे इन्ही उल्लुओं से है".वैसे हिन्दी मे एक जनप्रिय और व्याकरण संम्मत कहावत है कि-"किसी व्यक्ति को बीना A सर्टिफिकेट के गाली देनी है तो उस व्यक्ति को नेता कह दिजिये".
दिवाली से पहले ही इन्हीं मे से किसी श्रेष्ठ उल्लु को ये राष्ट्रीय पुरस्कार दे करके मोदी सरकार को ये उपलब्धि भी अपने नाम दर्ज कर लेनी चाहिये.अगर समय रहते ही इस राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा हो जाये तो ठीक है नही तो किसी वर्ष इन्हीं उल्लुओं मे से कोई एक "अरविंद केजरीवाल टाइप का उल्लु,समस्त उल्लुओं के हक के लिये संघर्ष का बिगुल फुक अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जायेगा".फिर वही होगा कि एकदिन देश के कई राज्यो मे उल्लुओं की सरकार बन जायेगी.
अतः ये मेरे द्वारा लिखा गया महज एक लेख भर नही अपितु, दिवाली से पहले उल्लुओं के हित और हक पे लिखा एक "ऐतिहासिक उल्लुनामा" है.
यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
Mo.no.7800824758
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