Thursday, 16 April 2020

लघुकथा---(मयूरी )

लघुकथा----(मयूरी )

 शहर के खचाखच भरे हुए हाल में शास्त्री नृत्य का आज आखिरी दिन था, सभी प्रतिभाग करने वाली लड़कियां एक-एक कर अपना  नृत्य प्रस्तुत कर चुकी थी. उन्हीं में अगला नाम मयूरी का भी लिया गया और जैसे ही मयूरी  स्टेज पर आई तो उसने सबसे पहले निर्णायक मण्डल फिर उस हाल में बैठे तमाम दर्शकों का अभिवादन किया. फिर इसके बाद मयूरी के पांव थिरके तो सभी कि मानो धड़कनें थम गई हो.  मयूरी के पाव के घुंघरू व उसके नृत्य का जादू ही कुछ ऐसा था.  फिर जब उसके पांव रुके तो ऐसा लगा जैसे मयूरी अभी नाच रही हो. 

 सारे दर्शकों और निर्णायक मंडल के निर्णय जिसका कि मैं स्वयं चीफ गेस्ट था.हम सभी ने मिलकर प्रथम पुरस्कार के लिए जैसे ही    मयूरी का नाम लिया दर्शको से भरा हुआ पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. वे जब अपना पुरस्कार लेने के लिए स्टेज पर आई और मैंने उसे जब पुरस्कार थमाया तो मैंने मयूरी से ढेर सारी बातें करनी चाहि पर  वह मुझसे कुछ बोली ही नहीं,  तो मुझे कुछ अटपटा सा लगा मैंने आयोजक मंडल की तरफ देखा तो  उन्होंने झट मुझे बताया कि मयूरी--"जन्म से गूंगी है" वे कुछ बोल नहीं सकती.  मैंने कहा नहीं मयूरी गूंगी नहीं है वे अपनी कला से खुद इतना बोलती है कि जुबान वाले क्या उतना बोलेंगे, हां मैं इस मयूरी और इसकी कला को कभी गूंगी नहीं रहने दूंगा बल्कि मैं मयूरी से शादी कर आजीवन इसके  इस कला की आवाज को मै अपने कानो से  सुनता रहूंगा और मेरी मयूरी बोलती रहेगी. 


यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin.no. 222002 (U  P)
Mo. no. 7800824758

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