हमारे गाँव की रामलीला के मंचन का ये जादुई चालीसवां वर्ष है.इस रामलीला के तमाम कीर्तिमान है,जो किवंदतियो की तरह काफी रोचक है. इसके किस्से जब सुने व सुनाये जाते है,तो बिना पूरा सुने उठा ही नही जाता. इस रामलीला की प्रसिद्धी गाँव-जवार तक ही नही अपितू पूरे राज्य में है.
इस रामलीला को देखने के लिये लोग महिनो पहले ही किसी न किसी जुगत मे लग जाते है.जो भी व्यक्ति यहां की रामलीला देखकर जाता है तो दुसरे वर्ष खुद-ब-खुद खिचा चला आता है. इस रामलीला के तमाम कलाकार छः महिने पहले से ही अपने-अपने मिले हुये किरदार की प्रेक्टिस करना शुरु कर देते थे. ये कलाकार भी कोई--"ऐरे-गैरे नत्थुखैरे न थे" वे जीवंत और एक से एक अलौकिक कलाकार थे.
इन्ही रामलीला के अलौकिक कलाकारों मे कभी--"राम बने इसी गाँव के हमीद मियां थे".जिनका नाम आज भी इस रामलीला के लिये अजर और अमर है. कहते है कि इस रामलीला में--राम का चरित्र या किरदार जैसा हमीद मियां ने निभाया ,वैसा फिर इस रामलीला में राम बने, किसी भी किरदार ने नही निभाया.
सच तो ये है कि हमीद मियां एक मुसलमान नही अपितू वे उस विषम कालखंड के हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे और गाँव की लोकप्रिय रामलीला के सच्चे अर्थो मे राम थे.जानने वाले या ना जानने वाले भी केवल उन्हे रामलीला मे राम के रोल मे देखने के कारण,हमीद मियां नही अपितू राम कहकर ही बुलाते थे.
वे खुद भी भुल गये थे कि--उनके घर वालो ने उनका नाम हमीद रखा था.लेकिन उनका रामलीला में राम बनना इतना आसान भी नही था. उन्हे रामलीला मे राम बनने के लिये बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. इसके लिये उन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनो की ही कंटरपंथ का सामना करना पड़ा था--"तीन बार उन्हें थाने की भी हवा खानी पड़ी थी".
लेकिन शायद भाईचारे और मोहब्बत की पैगाम के लिये,मालिक भी बीच-बीच में हमीद मियां जैसे लोगो को ज़मी पे भेजता रहता है. ताकि इंसानियत और मोहब्बत के चराग की रौशनी बुझने न पाये. आज इस रामलीला के मशहूर राम हमीद मियां नही है,लेकिन ये उन्ही की मुकद्दस देन है कि--"मेरे गाँव के लोगो ने हमीद होना सिखा लेकिन कभी भी कट्टर हिन्दू या मुसलमान होना नही सिखा"
यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
Mo.no.7800824758
No comments:
Post a Comment