(घुरहू यादव की साइकिल का देहावसान)
घुरहू यादव की मोटी मूँछ और साइकिल पुरे गाँव जवार ही नही बल्कि तहसील तक चर्चित है. वे इसे अपनी पत्नी के बाद सबसे ज्यादा प्यार करते है .क्योंकि ये साइकिल उनके जीवन की कोई साधारण या लोकल साइकिल नही,बल्कि उनके ब्याह के दिन खिचड़ी खाते समय उनके ससुर द्वारा दी गई सबसे अविस्मरणीय निशानी है.
उन्हे वे दिन अब भी बहुत अच्छे से याद है जब वे इस साइकिल पे बैठ घर पहुँचे थे तो--उसी दिन रेडियो अर्थात आकाशवाणी से ये समाचार सुनने को मिला था कि इस प्रदेश मे एक एैसी पार्टी का गठन हुआ है जिसका चुनाव निशान साइकिल है,तब से वे अपने साइकिल को अपने लिये शुभ मानने लगे.
यहीं एक कारण उनके आजीवन सपाई होने का रहा!उन्होनें अपनी साइकिल और सपा के चुनाव निशान साइकिल के तमाम उतार-चढ़ाव वाले दिन देखे,फिर भी कभी उनको अपनी साइकिल को लेके कोई ठेस या पिड़ा नही पहुँची.""वे मूँछो पे ताव दे कहते भी थे--कि हमारे प्रदेश मे जितनी मजबूत यादव जाति है,उतनी ही मजबूत उनकी लट्ठ और प्रधान साधन उनकी साइकिल भी है।""
फिर घुरहू यादव की नई पिढ़ियो ने तमाम साधन लिये संपंन्नता आई उन्हे खड़ी करने के लिये गैराज बने,लेकिन उनका अब भी अपनी चारपाई के बगल मे साइकिल उसी तरह खड़ी करने कि वे आदत नही गई,उनकी इस बीमारी से पत्नी कई मर्तबा चिढ़ी,लेकिन वे अपनी पत्नी और साइकिल को मनाने मे काफी सिद्धहस्त रहे.
सच तो ये है कि अगर इस लेख मे मै लिख दु""कि साइकिल पे इतना इतराने बलखाने वाला शख्स न मैने लखनऊ और नही कभी समाजवादी पार्टी मे किसी नेता को देखा----मुझे गर्व है घुरहू यादव के चरित्र पे जिन्होने कभी अपनी मूँछ और अपने साइकिल प्रेम से बेवफ़ाई नही की"".
जबकि सियासत के कुछ तथाकथित साइकिल सवारों ने इस साइकिल की इज़्ज़त मान-मर्यादा का इतना अपमान किया कि अगर ये साइकिल कोई औरत होती तो एक गैलन पेट्रोल छिड़क खुद को आग लगा लेती.
आज मै घुरहू यादव के घर की तरफ ज्यो निकला तो मेरी नजर उनसे मिली मुझे वे इतने दु:खी दिखे कि मै उनसे बीना बोले खुद को रोक न सका क्योंकि मैने इस कांति पुरुष को इतना कभी हताश और दु:खी नही देखा,""पहली बार सपा के नेताओ की तरह उनके मूँछो के बाल आपस में उलझे और झगड़ते से दिखे।""
आज घुरहू यादव की वे लपलपाती मूँछ,वे मुस्कुराती आँख बड़ी मलिन रुख अख्त़ियार किये थी,उनके बगल मे खड़ी साइकिल भी उनके ब्याह के बाद से ये शायद ये पहली बार है जब उन्होनें पाँच-छ: दिन से उसे छुवा,सहलाया और अपना वे प्यार नही दिया जिसकी अभ्यस्त ये साइकिल हो चुकी है.
मेरे बोलते ही जैसे उनकी उस पिड़ा का बांध टूट गया,गला भरभरा आया""इतना दर्द शायद सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव के चेहरे पे भी पिछले दिनो से नही देखी जितना दर्द और पिड़ा उनके उस चेहरे से छलक रहा था"".
वे बोले बेटा-----""जो साइकिल आजीवन मेरे लिये शुभ रही आज उस साइकिल को,कुछ अशुभ लोगो ने मिलकर मार डाला,वे स्वार्थी लोग भुल गये सुख-सुविधा ने उनकी आँखो पे पर्दा डाल दिया है!बेटे ये केवल----साइकिल की रार भर नही बल्कि एक युद्ध है जिसमे लहुलूहान उन तमाम साइकिलो की लाशे पड़ी है जिसने इस प्रदेश मे तमाम नौनिहालो ने एक युग का उत्थान देखा है""
बेटे इस रार से प्रदेश मे ना जाने कितने घुरहू यादव और उनकी साइकिलो का देहावसान हुआ है!कल फिर समाजवादी पार्टी खड़ी हो सकती है,प्रदेश मे सरकार बना सकती है,लेकिन उन तमाम घुरहू यादवो के साइकिलो की आत्मा इन पितृ हंताओ को कभी भी माफ़ नही करेगी.
यह व्यंग्य लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है.
@@@लेखक----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियांंपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.-----7800824758
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