Sunday, 5 April 2020

लघुकथा---(पगली )

लघुकथा----(पगली )

वे पगली जिसे मैंने कॉलोनी के कभी इस कचरे, कभी उस कचरे पे  नंगे व मैले-कुचैले बदन बैठकर, अपने गंदे बालो को खुजलाते देखा है.वे पगली मेरी इस लघुकथा की नायिका यूँही नही बन गई इसके मूल में पगली के साथ हुआ वे हादसा भी है जिसे देख मेरी इस कलम का कलेजा भी कांप गया और इस सभ्य समाज पे मुझे ऊबकाई आई सो अलग. 

जिस पगली को काम व सेक्स की कोई संवेदना या समझ नही. जिस पगली के पास से दिन में गुजरते समय लोग अपना मुँह व नाक उसकी गंदगी से ढक लेते थे. उसी नंगी और गंदी पगली को उस दिन जब बरबस मेरी नजर पड़ी तो मैंने पाया कि--उसके होंठ सुजे हुए थे उसके नंगे बदन के चारो तरफ नाख़ूनो के गहरे-गहरे निशान थे. उसके दोनो स्तन भी पुरी पाशविकता की गवाही दे रहे थे. 

ये कॉलोनी वही है, सभ्य लोग वही है जो दिन में इस पगली के बगल से गुजरते समय अपनी नाक व मुँह ढक लिया करते थे. लेकिन इन्हीं नाक मुँह ढकने वाले किसी शरीफ की शिकार ये पगली उसे पहचान भी नही सकती. 

इस हादसे के नौ महीने बाद उस पगली ने सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया, जिसे किसी पैसे वाले रहिस ने अस्पताल को पैसे ले-देकर अपना लिया. फिर दो दिन बाद अस्पताल वाले एक बार फिर इसी कॉलोनी में उस पगली को छोड़ गये. पगली फिर इस कचरे, उस कचरे आ जा रही. लेकिन मेरी लघुकथा कि ये पगली फिर नोंची-खसोटी जाएगी, बलात्कार होगा, फिर कॉलोनी के शरीफ चुप्पी साध जाएंगे यही पाशविकता इस शहर या कॉलोनी में टहल रही हर पगली की है.  

यह लघुकथा मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है. 


लेखक---रंगनाथ द्विवेदी 
जज कॉलोनी, मियांपुर 
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758

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