हमारी और नीलू के बीच इतवार से एक दिन पहले यानी कि शनिवार को तू तू मैं मैं कंफर्म थी. फिर इसके बाद--"मोहब्बत के मौन युद्ध की शुरुआत , इस मौन युद्ध के लक्षण थे-- बिना बोले खाना निकाल कर थोड़ी सी आवाज के साथ थाली को पटकर सामने रखना, गिलास के पानी को भी कुछ यूं क्रोध की भंगिमा के साथ रखना कि उसने से दो-चार बूंद पानी का इधर उधर खाने की मेज पर गिर जाना". मुंह के हाव भाव से जैसे आज वे रोमांटिक लव स्टोरी नहीं बल्कि मोहब्बत के कश्मीर की ak-47 लग रही थी.
फिर बिना कुछ बोले बात किए बेडरूम में मेरी तरफ पीठ करके नीलू के सोने का वे नाटक मैं भली-भांति समझ रहा था, अक्सर वे जब शनिवार की रात को नाराज होती थी तो उस रात उसकी अन्य रात की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही चूड़ियां और पायल बजा करती थी, नीलू के इस आर्टिफिशियल गुस्से की अदा मुझे सोने से पहले एक बार जरूर मुस्कुराने के लिए मजबूर कर देती थी.
क्योंकि दूसरा दिन इतवार का होता था उस दिन नीलू के तू तू मैं मैं के गुस्से का टेंपरेचर शनिवार से कहीं ज्यादा बढ़ा हुआ होता था. और इतवार के दिन मैं उससे वैसे ही डरा और सहमा सा दिखने की कोशिश करता था जैसे कि मैं उस रविवार को डरा और शहमा था, जब नीलू से हमने अपने दिल की बात कही थी. एक तरह से रविवार हमारे और नीलू के मोहब्बत के इजहार का ही दिन नहीं बल्कि यह हम दोनों के मोहब्बत की एनिवर्सरी का दिन भी है.
मैंने शाम को गैरेज से बाइक निकालकर स्टैंड पर खड़ा करके, ज्योंही नीलू को लेने के लिए कमरे में पहुंचा तो देखा कि नीलू पहले से ही तैयार खड़ी है. लेकिन अभी भी उसी गुस्से के तापमान का अपने वे इजहार कर रही थी. नीलू बाइक पर बैठी तो लगा कि उसके गुस्से का तापमान अब थोड़ा घट रहा है उसका मुख्य कारण वे गोलगप्पे की दुकान थी जहां पर मैंने और नीलू ने शादी से पहले गोलगप्पे खाए थे.
अब नीलू के होठों पर हल्की-हल्की बूंदा बूंदी टाइप की मुस्कुराहट चेहरे पर दिख रही थी. उसकी इसी मुस्कुराहट के दरमियान हमने दो दो प्लेट गोलगप्पे खा लिए, अब नीलू की आंखें थोड़ी बहुत गीली हो उठी थी मैं जानता हूं कि वे गोलगप्पे का पानी तीखा है का बहाना बनाकर अपनी मोहब्बत को छिपा लेने का प्रयास करेगी लेकिन वे छिपा नहीं पाएगी क्योंकि मैं अब उसकी इस आदत को पहचान गया हूं. फिर घर वापसी के समय नीलू मेरी मुझसे यह हमेशा की तरह कहेगी कि जानते हैं कि मैं आपसे नाराज थोड़ी न थी बस आपके साथ मुझे इतवार को गोलगप्पे खाने थे.
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin.no.222002 (U P)
Mo.no.7800824758
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